जेएनयूएसयू प्रेसिडेंशियल डिबेट : बेरोजगारी समेत राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की गूँज  

मंगलवार, 4 नवंबर को जेएनयू में छात्र संघ का चुनाव है। इस चुनाव में ये माना जा रहा है कि लेफ्ट यूनिटी पैनल एवं एबीवीपी पैनल के बीच सीधा मुकाबला है। लेफ्ट का गढ़  माने जाने वाले इस विश्वविद्यालय में एबीवीपी येन केन प्रकारेण छात्र संघ का अध्यक्ष पद जीतना चाहती है। 

बीती रात  प्रेसिडेंशियल डिबेट में जिस तरह से लेफ्ट यूनिटी की आइसा प्रत्याशी अदिति मिश्रा ने जोरदार ढंग से बेरोजगारी, शिक्षा समेत केंद्र सरकार की छात्र युवा विरोधी नीतियों को लेकर एबीवीपी को कठघरे में खड़ा किया उसका कोई जवाब एबीवीपी प्रत्याशी द्वारा दिया नहीं जा सका।

उन्होंने अपने भाषण में बेरोजगारी का मुद्दा जिस प्रभावशाली तरीके से उठाया, उसे पार्टी लाइन से परे जाकर हर धारा के छात्रों ने समर्थन किया। बेरोजगारों के शांति पूर्ण आंदोलन, यूनिवर्सिटी कालेजों में फीस वृद्धि जैसे सवालों पर भाजपा सरकारों द्वारा बर्बर दमन, नियुक्तियों में फर्जीवाड़ा जैसे उनके द्वारा उठाए सवाल चुनाव के केंद्रीय विषय बने हुए हैं। 

वहीं एबीवीपी की ओर से प्रत्याशी विकास पटेल ने एक बार फिर अपने पितृ संगठन आरएसएस की अपनी राजनीति के अनुरूप छात्रों को विभाजित करने वाले नारे लगवाए। उनके भाषण में बेरोजगारी जैसे ज्वलंत मुद्दे गायब रहे। उनके भाषण में पूरा फोकस भाजपा व आरआरएस के वैचारिक मुद्दे रहे जिनका छात्रों व युवाओं के हितों से कोई लेना-देना नहीं है।

एबीवीपी ने अपने प्रचार में वाम संचालित जेएनयूएसयू पर यह भी आरोप लगाया कि जेएनयू में फंड कटौती के मुद्दे को लेकर संघर्ष नहीं किया गया जबकि सर्व विदित है, केंद्र सरकार की नीति देश भर में उच्च शिक्षा में बजट में भारी कटौती की है जोकि नई शिक्षा नीति 2020 में साफ तौर पर है।

बौद्धिक बहसों के लिए प्रख्यात जेएनयू में आम छात्र भलीभांति समझता है कि कैम्पस में फंड कटौती, सुविधाएं की कमी, छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला केंद्र सरकार की नीतियों की वजह से है। यही वजह है कि प्रेसिडेंशियल डिबेट में एबीवीपी प्रत्याशी के तर्कों को आम छात्रों ने  नकार दिया।

विदित हो कि 1 नवंबर को अन्य प्रत्याशी के डिबेट कार्यक्रम में एनआरसी सीएए विरोधऔर दिल्ली दंगों की साज़िश के आरोप में  जेल में बंद जेएनयू के छात्रों को देशद्रोही करार देते हुए एबीवीपी समर्थकों ने उन्हें फांसी देने  के नारे लगाए जबकि 5 साल से अभी तक इन आरोपों पर ट्रायल भी नहीं शुरू हुआ है।

इस विचारधारा का जो उन्मादी रुख है उसी की परिणति देश में समाज को विभाजित करने में होती है ताकि जिन नीतियों से आम जनता तबाह हो रही है उनके एकताबद्ध न हो सके।

प्रेसिडेंशियल डिबेट में एसएसयूआई, पीएसए के प्रत्याशियों ने भी तकरीबन उन्हीं मुद्दों को उठाया जो लेफ्ट यूनिटी पैनल द्वारा उठाए गए थे।

जो अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे डिबेट में छाए रहे उसमें सोनम वांगचुक की अनुचित ढंग से की गई गिरफ्तारी, पंजाब में चल रहे किसान आंदोलन का दमन, खास विचारधारा के लोगों द्वारा रेपिस्टों का सम्मान और संरक्षण, तथाकथित सनातनियों द्वारा वंचित समुदायों पर हो रहे अत्याचार के साथ ही संविधान व लोकतंत्र की रक्षा जैसे मुद्दे छाए रहे।

इन मुद्दों को लेकर छात्रों की ओर से बड़े पैमाने पर सवाल आए जहां लेफ्ट यूनिटी के प्रत्याशी अदिति मिश्रा ने भाषण में उठाए गए मुद्दों को लेकर प्रतिबद्धता दोहराई वहीं  एबीवीपी प्रत्याशी के पास इन ज्वलंत मुद्दों को लेकर के कोई जवाब नहीं था लेकिन अपने चरित्र के अनुरूप एक बार फिर वही पुराना राग अलापा गया।

इस प्रेसिडेंशियल डिबेट में लेखक प्रत्यक्ष दर्शी रहा वहीं कई दिनों से इन प्रश्नों पर सैकड़ों छात्रों से चुनाव प्रक्रिया के दौरान उनके विचार भी जाने। बातचीत में ये उभर कर आया कि जेएनयू जैसे कैम्पस से  शोध करने के बाद भी छात्रों को सामान्य किस्म के रोजगार के लिए जद्दोजहद करना पड़ रहा है। 

इधर के ग्यारह वर्षों में केंद्र सरकार की नीतियों ने भयावह बेरोज़गारी की स्थिति पैदा की है। ये एक राष्ट्रीय मुद्दा है और जेएनयू इलेक्शन प्रचार और प्रेसिडेंशियल डिबेट में बेरोजगारी संकट या रोजगार मामले का उभर कर आना इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय  वैचारिक बौद्धिक विचार विमर्श के  साथ ही शिक्षा और बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर एक नई मुहिम का प्रेरणास्रोत बनेगा।

इसी से भाजपा, आरएसएस को बेचैनी है और कोशिश है कि अभी भी किसी भी कीमत पर चुनाव जीता जाय। हालांकि छात्र इसको लेकर सचेत हैं और जिस तरह चुनाव प्रक्रिया को जानबूझकर एबीवीपी द्वारा जेएनयू प्रशासन और सत्ता तंत्र के सहयोग से गुंडागर्दी और साम,दाम, दंड ,भेद के माध्यम से जेएनयू छात्र संघ पर कब्जा करने की रणनीति बनाई थी वह नाकाम होती दिख रही है।

इस पर गौर करना बेहद महत्वपूर्ण है कि जेएनयू छात्र संघ की चुनावी प्रकिया में जेएनयू प्रशासन अथवा किसी बाहरी एजेंसी का किसी तरह का दखल नहीं होता। छात्रों की आम सभा बैठक (जीबीएम) में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनाव समिति चुनी जाती है और यह चुनाव समिति नोटीफिकेशन से लेकर के प्रेसिडेंशियल डिबेट, वोटिंग और काउंटिंग तक की प्रक्रिया यही चुनाव समिति संचालित करती है. लेकिन इस खूबसूरत और विशिष्ट लोकतांत्रिक परंपरा को एबीवीपी ने एक बार फिर भंग करने की कोशिश की।

जीबीएम में एबीवीपी द्वारा आम छात्रों और जेएनयूएसयू अध्यक्ष पर हमला किया गया। बताया जाता है कि इस मारपीट में कुछ बाहरी तत्व थे और उन्हें जेएनयू प्रशासन का संरक्षण प्राप्त था। पुलिस द्वारा ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय उल्टे शांतिपूर्ण ढंग से छात्रों के प्रतिवाद कार्यक्रम में बल प्रयोग किया गया और अवैधानिक ढ़ंग से अध्यक्ष समेत अन्य छात्रों को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में ले लिया गया। यह घटना स्पष्ट प्रमाण है कि जेएनयू में एबीवीपी, जेएनयू एडमिन, पुलिस प्रशासन और सरकार का गठजोड़ यहां छात्रों की लोकतांत्रिक अधिकारों व आंकाक्षाओं के दमन पर आमादा है। 

यह भी नोट किया जाना चाहिए कि 2014 के बाद जेएनयू के छात्रों को बदनाम करने के लिए आरएसएस, भाजपा ने संगठित अभियान चलाया उसी कड़ी में लगातार केंद्र सरकार की शह पर दिल्ली पुलिस और जेएनयू एडमिन ने छात्रों के विरुद्ध बर्बर दमन का सिलसिला शुरू किया जो अभी  भी जारी है।

बात सिर्फ छात्रों को बदनाम करने और उनके दमन तक नहीं रुकी बल्कि पूरे जेएनयू की विरासत को खत्म करने, उसकी महान उपलब्धियों पर पर्दा डालने की कोशिश की गई जिसमें फिलहाल कामयाब नहीं हुए। जेएनयू का गौरवशाली इतिहास ये दर्ज कराता है कि यहाँ से अकादमिक, कला, संगीत, फिल्म, विज्ञान जैसे क्षेत्रों में महान हस्तियां निकली हैं। जिनका राष्ट्र निर्माण में बड़ा योगदान रहा है और किसी भी सरकार की जन विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध का भी इतिहास रहा है।  

कुल मिलाकर अब चुनाव में किसी बड़े उलटफेर की संभावना नजर नहीं आ रही है। छात्रों की यह आकांक्षा है कि उनका छात्र संघ ऐसा बने जो बेकारी और शिक्षा जैसे उनके भविष्य से जुड़े मुद्दों को हल करने के लिए पहल करे, और कैम्पस के उनके जो बुनियादी सवाल हैं  उनको हल कराए।

अभिषेक मिश्रा 

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